Sunday, 17 March 2019

होली आई .... ©




होली आई है रंगने यादों को फिर से 
उतरे ना बीते लम्हों की भांग सिर से 
उधर भड़की आग होलीका दहन की 
इधर दहकी सीने में चाह मिलन की। 

आज भी याद है........  वो गुलाल
 किया जिससे रूख़सारों को लाल 
वो नज़रें जो शर्म से हुई थी बेहाल 
वो शरारत हुई थी जो चुपके से 
वो चपत पड़ी थी जो फिर हौले से 
वो तुम्हारा आधी गुझिया से प्रेम जताना 
वो मेरा इशारों से लबों को छू जाना। 

याद है आज भी........ 
जब नज़रे बचाकर ठंडाई गटक ली थी 
हंसी ठिठोली के बीच चुटकी जो ली थी
भाँग के सुरूर में हिम्मत और बढ़ गई थी 
हया की चुन्नी छोड़ तुम भी डट गई थी 
हाथापाई में रंग भरी बाल्टी जो उलटी 
तुम्हारे बदले पड़ोस की भाभी रंग गई थी  

वो एक होली थी, आज भी एक होली है 
वो जो होली थी, वैसी ना अब होली है 
वो रंगो की छटा अब न बिखरनी है 
वो गाहे बगाहे भी न कही मिलनी है 
मगर होली की तपिश आज भी असरदार है 
वो मिलने की चाह ज्यों की त्यों बरक़रार है 



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Friday, 5 October 2018

वापसी .... ©


"सूखे पत्तों का शजर पे काम क्या है
तेरी ज़िन्दगी में मेरा अब मुक़ाम क्या है"

........ कहते हुए जैसे ही हमने उनकी तरफ देखा, उन्होंने नज़रे झुका ली और हथेली में फँसे कंगन को घुमाने लगी । हाथ में पैमाना थामे, उनकी तरफ बड़े हम और  .....

कुछ लोग होते हैं, दिखावटी से। जो दुनिया में दिखावा तो बहुत करते हैं, खुश रहने का। मगर, अंदर ही अंदर कुछ सालता रहता है, उन्हें। कहने को ठहरे, बड़े ही ख़ुशदिल। हमेशा लोगों से घिरे रहने वाले।  बात-बात पे मज़ाक करने वाले। कोई रूठे तो मनावे, कोई छूटे तो गले लगावे। मगर अपनी दिल की हर एक हरकत को सीने की परतों में दबा के रखने वाले। उस ख़ुश मिज़ाज़ चेहरें पे पड़ी दरारों से, हौले-हौले उदासी रिसते हुये दिल में कब उतर जाती है, पता ही नहीं लगने देते। जब ग़ुबार संभाला नहीं जाता है, तो होती है झुंझलाहट। उमड़ता है सैलाब और बह निकलता है, आखों के रस्ते से। मगर यह सब कुछ होता है, चार दीवारी के अंदर। जो ग़म के बादल छटते हैं, तो वो फिर निकलते हैं, एक नई मुस्कान लेके बाहर।

ऐसी ही हैं, यह मोहतरमा भी। कहने को हमारी दोस्त - जिगरी नहीं मगर हाँ, दोस्त तो हैं ही।
जुम्मा-जुम्मा कोई हफ्ता भर, पंद्रह दिन पहले की बात होगी। छुट्टी का दिन था।  बेटी का स्कूल भी बंद था, तो सुबह देर से ही उठे थे, की अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।  जाके देखा, तो चौखट पे खड़ी, बेसुध अंगूठे से घंटी का बटन दबाये जा रही थीं। कुछ ठीक नहीं लग रही थी।  चेहरे की हवाइयाँ उड़ी थी। हमने बिना कुछ पूछे उन्हें अंदर बुलाया। वो बिन कुछ बोले अंदर दाखिल हुई और सीधा डाइनिंग टेबल के पास जाके ही रुकी। हमने भी अखबार उठा के दरवाज़ा भेड़ा और अंदर आ गए।  उन्हें बैठने को बोल कर, पानी का ग्लास उठाया ही था, की वो बोल पड़ी -

"उनका फ़ोन आया था। "

"किसका ??"
- हमने गिलास में पानी उड़ेलते हुए पूछा।

"अब क्यूँ वापस आना चाहते हैं।  सब कुछ तो ठीक चल रहा था। अब क्यूँ ??"
- वो बोली।  शायद हमारे सवाल पे ध्यान ही नहीं दिया था उन्होंने।

उनके लहज़े में घबड़ाहट और गुस्सा दोनों एकसाथ छलक रहे थे। आँखें में नमी लिए, सवालों के बादल भी उमड़े हुए थे। हमने हाथ में गिलास थमाते हुए, एक कुर्सी खींची और बगल में  बैठ गए। हालांकि, हल्का सा इल्म था की बात किसकी हो रही है, फिर भी सवाल दोहराया -

"किसका फ़ोन आया था ? कौन आ रहा है ?"

लाल आँखों से हमारी तरफ देखते हुए, रुआँसी लहज़े में वो बोली -
"वो !!......  वो आ रहें हैं। ........ वापस। ........ मगर अब क्यूँ। "

अब ये "वो" कौन है, ये तो हम समझ ही गए थे। कुछ और पूछना हमने मुनासिब न समझा। ज़ख्मों को कुरेदने की फितरत नहीं थी हमारी और यहाँ तो ज़ख्म नासूर बन चले थे।

"इसमें घबराने की क्या बात है ? आने दो।  देखते हैं क्या कहना चाहते हैं।  हम सब लोग है ना, आपके साथ। "
- हौसला बाँधने की एक मुक़्क़मल कोशिश थी हमारी।

वो बोली -

" इसी उधेड़ बुन में, सारी रात जागते हुए कट गई। सुबह उठी थी, तो दिन भर के कामकाज की फेहरिस्त दिमाग में मौजूद थी। बड़ा मशक़्क़त भरा गुजरने वाला था दिन।  मगर फिर एक कॉल और दिमाग ही साथ छोड़ गया।  दिल की धड़कने बढ़ गई और नब्ज़ ठंडी पढ़ गई। सवालों का सैलाब उमड़ पड़ा दिमाग में।"

उनकी पेशानी पे छलकी नमी को, आँखों की नमी का सहारा क्या मिला, एक दरिया सा रुखसारों  पे बह निकला। वैसे ये सैलाब कोई नया न था।  सालों पहले इसके तबाही के मंज़र से रूबरू हुए थे और आज, एक बार फिर उसने रुख़ उनकी तरफ मोड़ा है। जो बीत गया था, वो वापस आ बना राहों का रोड़ा है।

हम हामी भरते हुए सुन रहे थे और वो बोले जा रही थी -

"जाना ही था तो वापसी क्यों कर रहे है आज ??
इतने साल कैसे साथ-साथ गुज़ारे थे मैंने, तिल तिल मरते हुये ?
हर रात बिस्तर पर तो वो लेटे रहते थे,  हम तो बगल में ही ज़मींदोज़ थे। घुटन और सिसकियों का क़फ़न ओढ़े हुये। अपना दुःख दर्द ही तो बाटना चाहते थे, उनके साथ। अश्क़ों से अचकन गीला करने की क़वायद थी।
मगर सिर्फ सीले हुए तकिये गिलाफ़ ही नसीब में लिखे थे। हर ख़्वाइश को "क्यूँ " के फावड़े से खोद के, सीने में दफ़न किया था, उसने। अरमानो के पर कुतर कर, चारदीवारी में क़ैद रखना चाहा था। "

"चाय लेंगी आप। " बीच में टोकते हुए हमने कहा।
"हैं...... !!! नहीं "
-उन्होंने हमारी पेशकश, सिरे से नकार दी। मगर फिर भी उठ के, हम चाय बनाने लगे। ध्यान नहीं था उनका हम पर, बस अपने में ही खोई हुए थी।
दुपट्टे की नोक को उँगलियों से घुमाते हुए बोलती जा रही थी -

"शक़ की सुई, हर बार, मेरे दिल में घोंपी थी, उसने। सिर्फ, एक कंधा चाहिए था सिर टिकाने को, आरज़ू-ए-दिल समझाने को। मगर इन्तहा तो तब हो गई, जब वो चार कंधो का इंतज़ाम करने पे अम्मादा हुए थे।
बड़े बेमुरव्वत हो हम उनके कूचे से निकले थे, सर झुका कर। कदम तो बढ़ चले थे, खात्मे की ओर। मगर न जाने ऊपर वाले को क्या मंज़ूर था। कहाँ एक ओर अपनी ज़िन्दगी मिटाने चले थे और कहाँ दूसरी ओर कोख़ में एक नयी ज़िन्दगी का बीज रोप दिया था, उसने। लड़खड़ाते कदमों और कांपते हाथों से बिख़री हुई ज़िन्दगी को, तिनका-तिनका समेटा था मैंने । "

एका एक उनकी आवाज़, हमें सख्त होती लगी थी। चाय का प्याला उनके पास रख, हमने उनकी सूनी आँखों को टटोलने की कोशिश जारी रखी थी। अपनी ही धुन में खोई, वो बोलती चली जा रही थी -

"ज़माने भर के नश्तर-ए-नज़र, झेलते-झेलते कैसे दस साल काट दिए, पता ही न चला। बेटी को भी अकेले ही पाला है। दुनिया के ताने तो झेल लिए जाते थे, मगर बेटी के सवालों के ज़वाब देना कितना मुश्किल होता है, पता है आपको ? आपको  कैसे पता होगा। "

ना में सर हिलाते हुए, हमारी नज़र अपनी छुटकी के कमरे की तरफ गई। सुबह के आठ बजे थे और वो अपनी लख्ते जिगर गुड़िया को बाहों में थामे चैन से सो रही थी। अभी थोड़ा वक़्त और था, उसके उठने में। लम्बी साँस भरते हुए हमने फिर उनकी ओर ध्यान लगाया -

"कैसे नौकरी की तैयारी की, कैसे इम्तेहान दिए, कैसे इंतज़ार किया था, मैंने पल-पल नतीजा आने का। सब कुछ, उन नौ महीनो के दौरान ही तो हुआ था। उसे कैसे पता होगा, मेरी क़ुर्बानियों का। जिस वक़्त सबसे ज़्यादा साथ चाहिए था उसका, उन नाज़ुक लम्हों में ही तो घर से निकाला था उसने। बेटी की परवरिश अकेले ही तो की है मैंने।  उसके लिए रातों रात अकेले जागी। वो चैन से सोती, तो सुकून मै पाती। दूध लाने को कोई नहीं होता था कई बार। कैसे उसे संभालूं ? कैसे बाज़ार जाऊँ ? "
- कहते-कहते रोने लगी थी वो।

उनकी बात सुनते-सुनते हमे याद आया की हमारी बेटी को भी दूध देना होगा। वर्ना सोते-सोते, वो भी रोने लग जाएगी। हम उठे और रसोई में दूध की बोतल तैयार करी। फिर कमरे में, चैन से सोई, अपनी बेटी के मुँह में लगाकर वापस आये। उन्होंने तो, ध्यान ही नहीं दिया, की हम क्या कर आये। वो तो बस लगी थी, अपनी ज़िन्दगी की क़िताब को पन्ने दर पन्ने, हमे सुनाने को।

"दफ़्तर और घर सम्भालने की दौड़ धूप में, अपने पे ध्यान ही नहीं दिया कभी।  फायदा भी क्या था - किसके लिए सवरतीं ? किसके लिए सजती ? कौन मुझे देखने आ रहा था।  कब कनपटी पे सफेदी घुल गई और कब झाईयाँ
चेहरे पे छा गई मालूम नहीं चला....... "

कहते कहते उनकी  आवाज़ और भारी हो गई। मन तो हुआ की आगे बढ़ के, उनके आंसू पोंछ दें। आगोश में भर कर कुछ हिम्मत बड़ा दे।  मगर मर्यादा की जिस झीनी सी चुनरिया को ओढ़  कर वो हमारे पास आई थी, उसी में लपेट के वापस भी भेजना था उन्हें।  वो विश्वास......... वो भरोसा........  बरक़रार रखना हम्मारी ही तो ज़िम्मेदारी थी। बस, उस ज़िम्मेदारी को निभाने में लग गए। समझाया, बुझाया की -
"वो आ रहें  है तो, आने दो। बात करो, क्या कहना चाहते हैं, सुनो। सोच समझ के, फिर फैसला लो। आखिर अपनी बच्ची की भी सोचो। उसकी ज़िन्दगी में बनी खाली जगह को भी भरो। एक अदद पिता की ज़रूरत है जिसे, उसे, उसके वाज़िब हक़ से जुदा तो न करो।"

शायद कुछ बात उनके ज़ेहन में उतरी थी ...... या नहीं, हम अंदाज़ा नहीं लगा पाए। चेहरे की भाव भंगिमाओं को जांचने में लगे थे, कि वो उठी और बाहर की ओर चल दी। जाते-जाते उनके, हमने सिर्फ इतना ही कहा की -

"शांत चित से एक बार फिर गौर फरमाइयेगा।"
- दरवाज़े पे रुक के उन्होंने हमे एक नज़र पलट के देखा और हामी भरते हुए वहाँ से निकल गई।

कुछ दिन बीते - न हमने उन्हें कॉल किया और न ही उन्होंने हमे कुछ बताया।  काम में मसरूफ तो दोनों ही थे, तो पूछने का वक़्त भी न मिला। फिर किसी रोज़, एक क़रीबी दोस्त ने हमे अपने यहाँ पार्टी पे बुलाया।  हमने भी बिना ना नुकुर किये ही जाने का मन बनाया। एक उम्मीद थी, उनके वहाँ मिलने की।

गिलास खड़क रहे थे, जाम छलक रहे थे। भरी महफ़िल में हम, तन्हाई का दामन थामे, कोने में खड़े थे। आँखों में दीदार की आस थी, तो होटों पे मय की प्यास।  सो आँखों को सुकून मिले ना मिले, कम से कम लबों की तिश्नगी को  घूँट दर घूँट बुझा ही रहे थे। एक तरफ़ शेर-ओ-शायरी के दौर चालू हुए तो दूसरी तरफ बढ़ती बेक़रारी के।
ज्यों-ज्यों घूँट लोगो के हलक से उतर रहे थे, दिल में भरे गुबार जुबां पे फूट रहे थे। शमा-ए-महफ़िल हमारे सामने आई ही थी के तभी वो दाख़िल हुई महफ़िल में -

"सूखे पत्तों का शजर पे काम क्या है
  तिरी ज़िन्दगी में मेरा अब मुक़ाम क्या है

    सब भुला, सुकून पाने की थी ख्वाइशें
फिर सीने में भरे ये इत्तिहाम क्या है "
   
........ कहते हुए जैसे ही हमने उनकी तरफ देखा, उन्होंने नज़रे झुका ली और हथेली में फँसे कंगन को घूमाने लगी । हाथ में पैमाना थामे, उनकी तरफ बड़े हम और तभी नज़र पड़ी उनके माथे पे।  वो लाल रंग, वो चेहरे की सुर्खियां सब बयां कर गई एक पल में। हमे अपनी
तरफ बढ़ता, देख वो एक किनारे खिसकी। और तभी पीछे से उनकी बेटी आई, अपने पिता की गोद में गले से लिपटे हुये।

उन्हें देख के हम भी वापस मुड़े और महफ़िल में शामिल हो अपनी ग़ज़ल को उसके अंजाम तक पहुँचाया-

"जब कभी नसीब ना हुई, रहमते खुदा की 
आसमाँ में टूटे तारे से अब आरज़ू क्या है 

 खा ही बैठे थे, क़सम दोबारा ना मिलने की,
झलक इक पाने की, ये जुस्तजू क्या है" 


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Sunday, 30 September 2018

मुक़ाम ..... ©






जीवन में पड़ाव तो बहुत आये, 
पर जो ना आ पाया, 
वो था ठहराव।

ज़िन्दगी चलती रही, 
पीछे-पीछे हम घिसटते रहे।

छूटे जो हाथ, 
आँखें तकती रहीं,
ऊपर से सख्ती हम दिखाते  रहे,
अंदर, अनकही,  कई बातें सुलगती रहीं।

गुज़रें जो लम्हे साथ साथ, 
उनही में थी शायद कोई बात।
अब तो बस वक़्त काट रहें है 
मसरूफ़ियत के आलम है 
और पेशानियों से जूझ रहे हैं।

वो ज़माने भी क्या ज़माने थे, 
यारी दोस्ती, हँसी ठिठोली, 
मन में लिये मौजाँ फिरते यहाँ वहाँ। 
अब तो सिर्फ़ यादों  के तकाज़े हैं, 
वर्ना कहाँ, अब वो लोग रोज़-रोज़ आते  हैं।

पलकों  की तिकोजियों से ढके, 
गुनगुने अफ़साने है। 
लोग पूछतें  बहुत हैं, 
पर ना, 
हमें अब नहीं किसी को सुनाने हैं।

परवाह बहुत की ज़माने की कभी,
अब बेपरवाही से गुज़रते ज़माने के लुत्फ़ उठाने हैं।

मगर........  
मग़र  जब भी अकेले होंगे तो दोहरायेंगे  
उन बीते लम्हातों को ज़ुबानी गुनगुनायेंगे । 
 ©

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Thursday, 2 August 2018

दिल नवाज़ीयाँ ....... ©




मन पे था पहरा चाक चौबंद, छोटी सी डिभरी में था जो बंद 
छूटा ना अपनी ही क़ैद से जो, तोड़ता कैसे टाट का वो पैबंद
दिल में  गहरे बहुत जज़्बात थे, लबों पे सतही से अलफ़ाज़ थे
गुमसुम से अरमानों को भींच, सुने-अनसुने फरमानों के बीच 
पलकों के शजरों पे उनकी,  कुछ कोयलें कूका करती थी
जिनकी हर कूक पे दिल की बत्तियां गुल हुआ करती थी
अधरों से उनके एक लफ्ज़ न फूटा,
कानो से हमारे कोई हर्फ़ भी न छूटा 
 कहे बिन ही हुई सब बयानबाज़ीयाँ,
बिन सुने ही क़ुबूल की दिल नवाज़ीयाँ 

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ज़र्द पन्ने ....... ©



ज़र्द पन्ने ....... ©

गुज़रे वो ज़माने, साथ ही गुज़ारे लम्हे भी 
गुज़रे लोग और साथ ही गई गुज़री तकरीरे भी। 

गुज़रते वक़्त की शाख पे, अब कोई कोपल न फूटेगी 
कोई कोयल हूक भी दे तो, उदासी की चील धर दबोचेगी।  

हिस्से में मेरे अब आधी-अधूरी कहानी है
उकेरी ज़र्द पन्नों पे, जो याद ज़ुबानी है

 कुछ छलके कतरे  ठंडी बेस्वादी चाय के
कुछ सूखे से धब्बे सियाह रौशनाई के

नुकीली कलम से उधड़न है,
 जहाँ आँखों से टपकी सीलन है

एक दाग़ भी है, वहाँ, मटमैला सा 
दौर-ए-ज़िन्दगानी, जहाँ, फैला सा।


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Thursday, 31 May 2018

फ़लसफ़ा .... ©




फलसफों को कुरेदती, ना जाने क्या हसरत है मेरी 
वजूद को हरसू  तलाशती, अजीब ही फितरत है मेरी। 

कारस्तानियों की सज़ा है हमारी या ...... 

लिखते-लिखते कलम थम गई। कुछ गुस्ताख़ बूँदें थी, जो पलकों से टपकी और उँगलियों से फिसल कर, कागज़ को नम कर गई। पथराई सी आँखें, फिर उसी धुंधली तस्वीर पे जम गई। एक सैलाब उमड़ा सीने में और दिल के दलदल में, रूह मेरी अटक गई। काटो तो जिस्म से बहते, हर एक क़तरे में, उन्ही की रुमानियत घुली मिलेगी। मगर बोझिल मन और तरसाई नज़रे, ना जाने कब, राहतों से सराबोर होंगी।

मन खट्टा हुआ तो उठ गए कुर्सी से। यादों के दरीचे से निकल, छज्जे पे आ गए। धौलाधर की हसीन वादियाँ और ठंडी हवा के आवारा झोंके, अपना काम बाख़ूबी कर रहे थे, मगर हम भी तो सदियों के जले थे। वो कसक मन से इतनी जल्दी कहाँ  ख़िसक सकती थी। वो जो जलन थी, भला सुकून में वो तब्दील कैसे हो सकती थी। सुकून की तलाश में दुनिया जहाँ से भाग के देखो पहुंचे भी कहाँ थे, हम।  उसी जगह, जहाँ कदम दर कदम उनकी ही यादें चस्पा थी। ये इंसानी फितरत भी अजीब होती है, कस्तूरी मन की भी यही रीत होती है। जिसे भूलना चाहता है, उसी की यादों के आँचल तले, न जाने क्यूँ हर बार छुप जाता है।

खैर, न ही चैन पड़ा और न ही क़रार आया। सोचा, चलो थोड़ा टहल के आते हैं। एक तलब जो उठी है, उसे ही कुछ अंगारे सुलगा कर बुझाते हैं। मफलर, कोट और काला टोप डाल के हम चल दिए बाहर की ओर।
होटल के गेट पे खड़े गोरखा दरबान ने सलाम करते हुए पूछा- "शाबजी, गाड़ी बुलवा दूँ !!"
अपनी हथेलियों से सलाम का और ना में सर हिलाके, उसके सवाल का जवाब देते हुए, हम नाक की सीध में चलते चले गए।  होटल से बाहर निकल के हरारत में कुछ कमी ज़रूर आई।  पहाड़ी आबो हवा ने, कम से कम, कमरे की घुटन से तो निजात दिला ही दी थी।

बारिश से धुली और चिनार के पीले-पीले पत्तो के गलीचे से पटी, सड़क पे कदम अपने आप ही चल पड़े थे। तूफ़ान के बाद की ख़ामोशी हमारे मन मुताबिक ही थी। धुंध की तरह छाए बादल, हमारे गालों की नमी को और बढ़ा रहे थे। चलते-चलते महसूस हुआ कि, रास्ता भटक गए थे हम। एक मोड़ आया था। सड़क से उतर कर, बेसाख़्ता पतले से कच्चे पहाड़ी रास्ते पे चल दिए थे। रास्ता वही था, मगर वक़्त वो न था। किसी रोज़, साथ-साथ इन्ही राहों पे भटकते थे हम और आज ....... तन्हा ही चल रहे थे।

देवदार और चीड़ के पेड़, रास्ते के दोनों तरफ हमसे मुँह मोड़े खड़े थे। उन कतारों को देख यूँ लगा, मानो हमारा अकेले आना उन्हें भी नाग़वार गुज़र रहा था। झाड़ियों के झुरमुट, बीच-बीच में रास्ता रोकते थे, मानो वापस भेज के उन्हें साथ लाने की तक़रीर कर रहे हों।  कुछ देर में, सामने फिर वही टपरी थी और अंगीठी में चाय बनाते वही "चच्चा जान"। थोड़े और उम्रदराज़ लग रहे थे आज। हमने जाके चच्चा को सलाम किया और हमे देख कर उनकी चेहरे की सिलवटे खिंचती चली गई। हमने मन ही मन सोचा - "चलो कोई तो हमारी मौज़ूदगी से बेज़ार न हुआ।"
चच्चा ने कहा - "इस बार बहुत सालों बाद आये, बेटा।"
उनके बेटा कहने में एक अपना पन सा लगा। शायद यही अपना पन ढूढ़ते-ढूढ़ते यहाँ तक खींचे चले आये थे।
"हाँ चच्चा, इस बार बहुत साल लग गए।" एक ठंडी सी आह भरते हुए हमने कहा।
अगल-बगल झाँक के उनकी नज़रों ने वो सवाल दाग ही दिया - "अकेले !! वो कहाँ हैं ?"
मगर पूछने की हिम्मत नहीं हुई शायद। चलो अच्छा ही हुआ, पूछ लेते तो शायद बताना हमारे लिए दुश्वार हो जाता। चच्चा ने एक कुल्हड़ में गर्म चाय भर कर हमारी तरफ बढ़ाई। चाय की गर्माहट, जिस्म से लेकर यादों तक को भड़काती चली गई। हर एक चुस्की में इलाइची और अदरक का स्वाद आज भी वही था। वही स्वाद जिसकी वो दीवानी थी.......

"मुसू मुसू हासी देओ मलाय लाय, मुसू मुसू हासी देओ......... " कुछअजीब से शब्द गुनगुनाते हुए उन्होंने हमारी तरफ देखा।
"हे, शान का है न ये गाना। मगर यह मुसू मुसू हासी क्या है भाई ??"हमारे दोस्त ने फुसफुसाते हुए पूछा।
चाय की चुस्की लेते हुए हम मतलब तलाश ही रहे थे की दूसरे दोस्त ने चुटकी लेते हुये कहा-
 "आई थिंक, शी वांट्स टू गो सूसू !!"
खिलखिलाके सबकी हँसी छूट पड़ी। चाहे हमारी चंडाल चौकड़ी हो या उनकी ज़हीन जमात।
मगर उनके चेहरे पे हँसी न थी। सुर्ख लाल-लाल रुखसारों पे दो पनीले मोती लुढ़क गए, जिन्हे पोंछते हुए वो आगे बढ़ गई। उनकी मग़रूर सहेलियों को भी उनके लिए चाय छोड़नी गवारा न हुई।
"अंग्रेज़ी के फूफा, जुबां पे लगाम रखा कर। " दोस्त को झाड़ते हुए हम उठेऔर भागे उनकी तरफ। झरने की तरफ बढ़ते उनके कदम सुस्त होने का नाम ना ले रहे थे और हमारी फूलती साँसों में वो दूरी तय कर पाने की हिम्मत जवाब देती जा रही थी। कुछ देर और पीछे-पीछे चलते हुए हमने ज़ोर से आवाज़ लगाई -
"सुनो। थम के ज़रा बात तो सुन लो। "

रुक के उन्होंने पीछे पलट कर देखा। हम भी उनके पास ही जाकर रुके।
कान पकड़, हाँफते हुये बोले "अपने दोस्त की गुस्ताख़ी के लिए, हम, आपसे माफ़ी माँगते हैं।"
बिना कुछ बोले, वो आगे बढ़ गई।
"माना हम से हो गई एक छोटी सी खता, हँस दो ना तुम ज़रा, दो ना हमको तुम सज़ा........ " उन्हीं के गाने को अपनी लय पर आगे बढ़ाते हुये हमने दोबारा माफ़ी मांगी।
ये सुनते ही उनके कदम ठिठक गए। हमारी तरफ पलटी और -
"इट्स ओके।" कहते हुए वो आगे बढ़  गई।
इतनी जल्दी माफ़ी मिलने की गुंजाईश हमें तो नहीं थी।
हमने फिर ज़ोर देकर कहा - "दिल से माफ़ नहीं किया आपने। "
हमारी तरफ पलटते हुए उन्होंने कहा - "जिनका दिल साफ़ होता है, उन्हें माफ़ी की ज़रुरत नहीं होती।  वैसे भी ख़तावार आप नहीं थे।"
ये सुन के दिल को राहत नसीब हुई - "हम दिल्ली से हैं, बी.टेक. थर्ड ईयर और आप ?"
"बायोटेक इंजीनियरिंग, टी. वाई. जयपुर से !" हमे देखते हुए उन्होंने फ़रमाया।
"पास ही है, बस पाँच घंटे में ..... " हमने कहा।
"बस से पाँच नहीं सात घंटे लग ही जाते हैं " मासूमियत से उन्होंने कहा।
"लगने को तो आठ घंटे भी लग सकते है......  " हमारे कहते ही उन्होंने सवाली निगाहों से हमारी तरफ देखा।
"अगर बस का टायर पंक्चर हो जाए " बात पूरी होते ही वो खिलखिला के हँस पड़ी।
"हँसती रहा कीजिये, आँसू जँचते नहीं आपकी आँखों में " हौले से हमने कहा।
"अच्छा जी !!"  कहते हुए वो आगे बढ़ी और हमारे दिल में उसी पल समाँ गई।

"बाबू माचिस !!" कहते हुए चच्चा ने हमारी तरफ डिब्बी बढ़ाई।
"कहाँ खो गए थे ?" उन्होंने पूछा।
होठों में फँसी सिगरेट को सुलगाते हुये हमने पूछा "वो झरना अभी भी वहीं है"
"जिसे जहाँ छोड़ के जाओ, वो वही पर सहेज के रख लेते हैं। चाहे यादें हो या झरना, पहाड़ों की यही तो ख़ासियत है बेटा। वो झरना, आज भी वैसे ही बह रहा है।" हमारे जज़्बातों की थाह लेते हुये उन्होंने कहा।
चच्चा की बात अधूरी छोड़, हम झरने की ओर चल दिए।
"संभल के जाना बेटा, बारिश से फिसलन होगी रास्ते में।" पीछे से चिल्लाते हुए चच्चा ने नसीहत से हमे नवाज़ा।
हर कश के उड़ते धुएँ में हमारा दिल भी सुलग रहा था। झरने की तरफ, ऊबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते पर हम बढ़े चले जा रहे थे। गुलाबी सफ़ेद फूलों से सजी "बिगेनबेला" की कटीली झाड़ियाँ हमारे कपड़ों में उलझ कर रोकना चाहती थी शायद। बारिश की फिसलन और रास्ते के बड़े-बड़े पत्थर हमे ज़मींदोज़ करने पर आमादा थे। सब मुसीबतों को नज़रअंदाज़ कर, बेफिक्रे से फ़िक्रमंद ,हम बढ़े चले जा रहे थे, अपनी ही धुन में।

पीछे से आवाज़ आई "अरे रुको तो, कहाँ भागे चले जा रहे हो।"
हमने पलट के देखा, तो वो अपनी नुकीली सैंडलों को संभाल के रखते हुए हुए हौले-हौले कदम बढ़ा रही थीं।
"अकेले ही जाना था तो शादी क्यूँ की ? हनीमून पर भी अकेले ही निकल जाते।" कुछ नाराज़गी से फूटे उनके अल्फ़ाज़ों ने हमारी रफ़्तार पे ब्रेक लगा दिया। वापस मुड़ के उनके पास आये और अपना हाथ उनकी तरफ बढ़ाया। गुस्से से लाल हुए रुखसारों पे आज कुछ ज़्यादा ही प्यार आ रहा था हमें।
हमारा हाथ झटकते हुए उन्होंने कहा -"अब रहने दो।"
"ठीक है, रहने देते हैं " कहते हुए हम जैसे ही वापस पलटे उन्होंने हमारी बाँह थाम ली।
मुस्कुराकर, उनके चेहरे से बिखरी ज़ुल्फ़ों को सवाँरते हुए, हमने सहारा दिया।
"मैंने तो पहले ही कहा था,  ये सैंडलें काम न आयेंगी, मगर किसी को बात माननी ही कहा है। "
हमारे कहते ही उन्होंने गुस्से में सैंडल उतार के फेकी और हमें झटक कर, नंगे पैर ही आगे बढ़ गई।
"अरे!! सुनो तो.......  " कहते हुए ज्यों ही हम आगे बढ़े, वो सरपट भागी।
"अरे रुको तो, इतनी तेज़ नहीं भागो पैर फिसल जायेंगे।" हमने ज़ोर से चिल्लाया।
मगर उन्हें कहाँ फ़िक्र थी। बस झरने पर पहुँच कर ही मानो दम लेनी थी। नंगे पाँव किसी तितली सी उड़ गई थी।
झरने पे पहुंच के, हाँफते हुए, हमने इधर-उधर देखा। दूर एक पत्थर पर बैठी वो नज़र आई।

"क्या हुआ ? थक गई क्या?" पास पहुँच के हमने पूछा।
"बहुत दर्द हो रहा है।" लाल-लाल रुआँसी सी आँखों से हमारी तरफ देख, अपने पैर में चुभे काँटे को दिखाते हुए वो बोली।
घुटनों पे आ हमने उनका तलवा पकड़ के काँटे को खींच निकाला।  उनकी दर्द भरी "सी-सी" के बीच पहले तो पानी से ज़ख्म धोया, फिर अपना रुमाल बाँध दिया।
प्यार भरी नज़रों से हमे निहारते हुए उनके आँसू अभी भी बह रहे थे।
 "मुसू मुसू हासी देओ मलाय लाय, मुसू मुसू हासी देओ......... " उनकी तरफ देख हमने धीमे से गुनगुनाया।
"भूले नहीं तुम अभी तक...... " कहते हुए उनके अधरों पे मुस्कान के कोपल फूट पड़े।
बाँहें खोल के हम अंदाज़-ए-शाहरुख़ में खड़े हो गए। वो उठी और दौड़ते हुए हमारी बाहों में समाँ गई। मगर उनके झटके को हम नहीं संभाल पाए और लड़खड़ा के गिर गए।

कपडे झाड़ते हुए हम खड़े हुए। चच्चा की नसीहत याद तो आई, मगर ज़रा देर से। तब तक पत्थरों पे जमी काई अपना काम कर चुकी थी और हम गीली मिट्टी में गिर चुके थे। गिरते-गिरते कानों में जो आवाज़ आई थी, बस उसी की ही दरक़ार तो थी हमें। थोड़ी दूर से गिरते झरने की गड़गड़ाहट आ रही थी।  हम उठे और उसी झरने की तरफ चल दिए। झरने पे पहुंच के हमने उसी पत्थर पे अपना आसन जमाया। बहते दरिया के पानी से मुँह धोया। एक और सिगरेट जला, वही टेक लगा के बैठ गए। झरने की गड़गड़ाहटऔर पानी से उठते बवंडर के बीच भी एक सुक़ूनियत भरी शान्ति थी। झरने की उथल-पुथल और उसके बाद कल-कल बहते दरिया की रवानगी में हमे अपना कल और आज झलक रहा था। वही ऊफान के बाद की शांति। सब कुछ उजड़ जाने के बाद, बचे खुचे कतरों को समेट बह जाने की फ़ितरत।

"तुम भी बौड़म हो। ज़रा सा धक्का न सँभाल पाए थे उस दिन !" उस पल को याद करते हुए वो खिलखिलाई और हम खीझ गये।
"आज भी ये दरिया तुम्हारी तरह बिगड़ैल लग रहा है। " बात बदलते हुए हमने कहा।
"सो तो है।" कहते हुए वो पानी में उतर गई। दो कदम में ही पानी ने घुटनों को डुबो दिया था।
"अरे संभल के...... बहाव तेज़ है।" हमने कहा।
"तो...... तुम हो न सँभालने के लिये। " कहते हुए उन्होंने पानी में हाथ डाल कुछ छींटे हम पे मारी।
"रुको अभी बताते हैं। ... " कहते हुए हम भी पानी में उतर गए और उनके ही अंदाज़ में जवाब देने लगे।

 तभी किसी के हँसने की आवाज़ सुन हम पलटे। सामने एक लड़की फूलों का गुच्छा लिए खड़ी थी।
"बाबू जी गुलाब लोगे। सिर्फ दस रुपए में।" उसने ज़ोर देते हुये कहा।
"नहीं चाहिए।" हमने झिडकते हुये कहा।
"आपके लिए नहीं.....  मैडम के लिए ले लो।" उसने फिर ज़ोर डाला।
"ले लो न एक।" हमारी मैडम ने पाला बदलते हुए फरमाइश कर दी। अब मना करते भी तो भला कैसे।
गुलाब का एक फूल ले कर हमने उसे पचास  का नोट पकड़ाया।
"टूटे दे दो बाबू जी........ खुले नहीं है।" लड़की ने मिन्नत की।
"रख लो। अपने लिए कुछ ले लेना।" हमारी मैडम ने प्यार से उसके गाल सहलाते हुए कहा।
"थैंक्यू !!!" कहते हुए वो आगे बढ़ गई और हम अवाक, उसे देखते रहे।
प्यार से हमारे मुँह को बंद करते हुए उन्होंने कहा "ये गुलाब मेरे बालों में लगा दो। "
"हैप्पी फ़िफ़्थ वेडिंग एनिवर्सरी " धीरे से ग़ुलाब को बालों में खोंस, हम उनके कानो में फुसफुसाए।

तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज़ आई "बाबू जी मौसम ख़राब हो रहा है।  आप लौट जाओ। "
पलट के हमने देखा तो वही लड़की खड़ी थी।  मगर इस बार थोड़ी और बड़ी हो गई थी। उसको बुला हमने गुलाब का एक फूल माँगा।
"आपके लिए ?" उसने पूछा।
हमने हाँ में सर हिलाया।
"... और मैडम? " गुलाब थमाते हुए उसकी निगाहों ने हमसे सवाल किया।
"तुम्हे याद है ?" हमने पूछा।
"उस दिन मैडम के दिए पैसो से मैंने अपने छोटे भाई के लिए दूध लिया था। " उसने भी सर हिलाते हुए कहा।
छलकती आँखों से उसे देखते हुए हमने पाँच सौ का नोट थमाया।
"टूटे दे दो बाबू जी........ खुले नहीं है ?" लड़की ने फिर उसी अंदाज़ में मिन्नत की।
"रख लो। इस बार अपने लिए कुछ ले लेना।" प्यार से उसके गाल सहलाते हुए, रुँधे गले से हमने कहा।
"थैंक्यू !!!" उसके कहते ही हम आगे बढ़ गए और शायद इस बार वो खड़े-खड़े हमे देखती रही।

वापसी में मौसम वाक़ई ख़राब हो चला था। लोगों की दिक्कतें बढ़ाने को आँधी बारिश क्या कम थी, जो ओले भी पड़ने लगे थे। खैर, हमें क्या, हमे तो आदत है। अब तो सिर्फ तूफ़ान ही, कहने को अपने बचे हैं। होटल के रास्ते में चच्चा की दुकान फिर आई।  मगर तब तक चच्चा दुकान बंद कर जा चुके थे। हम एक हाथ से कोट कस के पकड़े और दूसरे हाथ से टोप सँभालते हुए चले जा रहे थे। तेज़ हवाओं ने झाड़ियो  को दरकिनार कर हमारे लिए रास्ता साफ़ कर दिया था। मानो जल्द से जल्द, हमें इस इलाके से चलता करने पर आमादा हो।  ऊँचे-ऊँचे पेड़ भी हवा में सर हिलाते हुए, हमें यहाँ वापस न आने की हिदायत दे रहे थे। चलते- चलते, मन में चच्चा की कही बात खटकी। ये पहाड़ भी क्या वाक़ई सब कुछ सहेज लेते हैं ? वही जंगल, झरने, दरिया के पत्थर , चाय का स्वाद, बारिश, मिट्टी, काई, सौंधी यादें, बेमतलब बातें, नेक इरादे और वो लोग? उन दिल साज़ लोगों का क्या ? हमनवाज़ों को क्यूँ नहीं सहेज पाते ये पहाड़ ? क्या इन पहाड़ों की फितरत भी हमारी तरह है ? सब कुछ सहेज के रखा है हमने, उनकी याद में मगर उनको ही न रोक पाए। क्या पता वादियों ने शायद अपनी गोद में आज भी उन्हें सहेज रखा हो, बस हमारी ही कोशिशों में कमोबेशी रही हो।


होटल पहुँचे तो दरबान से सरसरी नज़र से हमें और हमारी हालत को देखा, फिर बेमने दरवाज़ा खोल दिया। कमरे में दाखिल हुये ही थे कि हमारी नज़र कैलेंडर पे गई। आज भी उन्नतीस फरवरी है, उस दिन की तरह। 
हर उस दिन की तरह, हाँ आज भी उनतीस फरवरी ही है। ठंडी मगर लम्बी और गहरी सांस भरते हुए हम दीवार से पीठ टिका कर खड़े हो गए। 
"उनतीस फरवरी"..........  चार साल में एक बार और फिर एक बार, चार साल लम्बा इंतज़ार। 
उनतीस ......... महीने पूरा होने से एक दिन कम या शायद तीस पूरा होते-होते रह गया निगोड़ा एक, फिर कम।
कहने को तो बस एक ही कम है.... मगर पूरा भी तो नहीं है। 
जैसे हमारी ज़िन्दगी, उनके बिना...... उनतीस ही रह गई।

कभी आधा, कभी पूरा ....... कभी पूरा होते-होते रह गया अधूरा। 
मगर उनतीस हो, फरवरी हो या हमारी ज़िन्दगी, आखिर अधूरी हैं क्यूँ ? इसका जवाब कौन देगा ?  इस बार जवाब ढूँढ़ने की मशक़्क़त में नहीं पड़ना था, हमे। सोचा, आधी हक़ीक़त, आधा फ़साना ........ एक ख़्वाब ही था, शायद कोई पुराना। 

गीले कपड़ों में ही बैठ गए। एक हाथ से पेशानिया, तो दूजे से कलम को सफ्हों पे कुरेदने लगे-


फलसफों को कुरेदती, ना जाने क्या हसरत है मेरी 
वजूद को हरसू  तलाशती, अजीब ही फितरत है मेरी। 

दिल की बाज़ी में दिल से ही मात खाये,
 हथेलियों पे छपी ऐसी खोटी किस्मत है मेरी



मिटाये न मिटे इबारत
कारस्तानियों की सज़ा मिली अब बस यही दिक्कत है मेरी।  

या मति गई थी मारी ?

कारसाज़ है जो ऊपर, शायद दिल्लगी हो उसकी, 
ख़ाकसार क्या जाने, बूझे भी वही पहेली है जिसकी। 

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Monday, 16 October 2017

अलफ़ाज़ .......©


अलफ़ाज़  .......©

बिखरने दो समां में, हवा में घुलने दो 

महक उनकी रोम रोम में बसने दो 

सोचूँ जब भी, जहाँ भी,जैसे भी 

बस तसव्वुर उनका ही बने रहने दो। 


आदत सी हो गई थी उनकी मुझे,

भली या बुरी अब आदत वो बरक़रार रहने दो। 

ज़िन्दगी के सहरा में, खोज मोहब्बत पाई कामयाबी,

अब वो शौहरत न हमसे यूँ छिन जाने दो। 


लगा उन्हें, हर बात बिन कहे ही हम भांपते थे,

पलकों के इशारों से उमड़ते जज़्बात पकड़ते थे। 

वो नाराज़गी में कही भिगो न दे पलके, 

बस इस ख़ौफ़ में हम सब कर गुज़रते थे। 


कहते थे वो, हमसा न मिलेगा तुम्हे कोई और, 

जाओ, जाके चाहे ख़ाक छान लो चहुँ ओर। 

बंजारे बन,उठा चिराग दर बदर भटकते हैं, 

उनके हर एक अलफ़ाज़ की अहमियत आज हम समझते हैं। 



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होली आई .... ©

होली आई है रंगने यादों को फिर से  उतरे ना बीते लम्हों की भांग सिर से  उधर भड़की आग होलीका दहन की  इधर दहकी सीने में चाह मिलन की...