Sunday, 30 September 2018

मुक़ाम ..... ©






जीवन में पड़ाव तो बहुत आये, 
पर जो ना आ पाया, 
वो था ठहराव।

ज़िन्दगी चलती रही, 
पीछे-पीछे हम घिसटते रहे।

छूटे जो हाथ, 
आँखें तकती रहीं,
ऊपर से सख्ती हम दिखाते  रहे,
अंदर, अनकही,  कई बातें सुलगती रहीं।

गुज़रें जो लम्हे साथ साथ, 
उनही में थी शायद कोई बात।
अब तो बस वक़्त काट रहें है 
मसरूफ़ियत के आलम है 
और पेशानियों से जूझ रहे हैं।

वो ज़माने भी क्या ज़माने थे, 
यारी दोस्ती, हँसी ठिठोली, 
मन में लिये मौजाँ फिरते यहाँ वहाँ। 
अब तो सिर्फ़ यादों  के तकाज़े हैं, 
वर्ना कहाँ, अब वो लोग रोज़-रोज़ आते  हैं।

पलकों  की तिकोजियों से ढके, 
गुनगुने अफ़साने है। 
लोग पूछतें  बहुत हैं, 
पर ना, 
हमें अब नहीं किसी को सुनाने हैं।

परवाह बहुत की ज़माने की कभी,
अब बेपरवाही से गुज़रते ज़माने के लुत्फ़ उठाने हैं।

मगर........  
मग़र  जब भी अकेले होंगे तो दोहरायेंगे  
उन बीते लम्हातों को ज़ुबानी गुनगुनायेंगे । 


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Sunday, 16 September 2018

बैरागी दिल....... ©


                                       Pic Courtesy - @Harrsha Dhanwariya




एक झलक में जिनकी खुश होता 
नज़रें इनायत को, उन्ही की तरसता 
उन्ही से, कभी बयान न कर पाता 
जिससे सब कुछ कहना चाहता
बेज़ुबान यह दिल....... 


ख्वाबों में तो रोज़ाना हुई मुलाक़ातें 
जानें क्यूँ , सामने जाने में शरमाये
 चुप्पी साधे, कनखियों से ताके
शायद, ना सुनने से क़तराये 
बेचारा यह दिल.....  

बेबाकी से किया इज़हार एक रोज़  
शायद फ़ना होने पे था आमादा
बर्फ से पिघले, हुए वो पहलुनशीं 
मुक़्क़मल चाहत में फिरे इतराता 
खुशरंग यह दिल .....

सीने से लगाता, रूख़सारों को सहलाता  
हर पल, कितना बेतकल्लुफ हुआ जाता    
जो भीगने से रहता बेहद ख़ौफ़ज़दा 
बारिश में भी कर रहा गुस्ताखियाँ 
बावरा वो दिल........

गुलज़ार रातें वीरान हो गई 
जाने से उनके तन्हाई हो गई  
छूटी पीछे कसक, जो कभी ना मिटेगी  
एक अजीब तिश्नगी, जो कभी न बुझेगी
बैरागी ये दिल....... 

जीते जी, बीते कल में उलझा चला जाता 
कैसे दिलासा दें, कि बेहद है तड़पाता 
क़िस्सा-ए-जूनून को जिसने था तराशा 
वो ही आज हकीकत से क्यूँ मुंह चुराता  
हाय, बेबस, यह दिल........ 



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Thursday, 2 August 2018

ज़र्द पन्ने ....... ©





गुज़रे वो ज़माने,
साथ ही गुज़ारे लम्हे भी 
गुज़रे लोग और साथ ही 
गई गुज़री तकरीरे भी। 

गुज़रते वक़्त की शाख पे 
अब कोई कोपल न फूटेगी 
कोई कोयल कूक भी दे तो  
उदासी की चील धर दबोचेगी।  

हिस्से में मेरे अब
आधी-अधूरी कहानी है
उकेरी ज़र्द पन्नों पे,
जो याद ज़ुबानी है

 कुछ छलके कतरे,
 ठंडी बेस्वादी चाय के
कुछ सूखे से धब्बे
 सियाह रौशनाई के

नुकीली कलम से उधड़न है
जहाँ आँखों से टपकी सीलन है
एक दाग़ भी है, वहाँ, मटमैला सा 
दौर-ए-ज़िन्दगानी, जहाँ, फैला सा।


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Sunday, 12 November 2017

गुफ़्तगू .... (भाग -१ ) ©




"दो नैना एक कहानी, थोड़ा सा बादल थोड़ा सा पानी और एक कहानी..... "

                                                                                                               ........ गुलज़ार 


हर तरफ बिखरे पड़े है चेहरे। कुछ इंसानी, कुछ रूहानी।  दूर तलक देखिये बिखरी पड़ीं है कहानी। कुछ को तो जाने, कुछ अभी तक ना पहचानी। शून्य है कुछ आँखें, तो कुछ है बड़ी रुबानी। कुछ में है दर्द, तो कुछ को है बातें छुपानी। मज़ा तो तब है, जब उनकी कहानी जाने उन्ही की ज़ुबानी। वर्ना कहेंगे "साहब, हरगिज़ नहीं है सच, सब है कही सुनी अफवाहें पुरानी। "

तो साहब गौर फरमाए, बात है उस ज़माने की। अब आप सोच रहे होंगे कि किस ज़माने की ? अरे सब्र रखिये ज़नाब, बताते हैं। पर्दा हौले-हौले ही उठाते हैं। लुत्फ़ गरम चीज़ों का हलकी हलकी चुस्कियों से ही जमातें है। उसी ज़माने की जो हम सब की ज़िन्दगी में एक बार तो आया, फिर कभी किसी ने वापस ना पाया। वादियों में जब बर्फ पिघल चुकी थी, मगर गर्मी कहर ढहाने का मन न बना पाई थी।  हिमालय की तलहटियों में अभी भी रातें ठंडी थी। कालेजों में परीक्षायें होने वाली थी। ना ना गलत, बिलकुल नहीं।  ग़लत ना समझ लीजियेगा, ये कॉलेज की कहानी नहीं है  मगर विद्यार्थियों के जैसे अल्हड़ रवैये दिखाते परिपक़्व व्यक्तियोँ की आप बीती है।

तो मुद्दे पे वापस आतें  है।  बात चल रही थे चेहरों की, तो जनाब ऐसा ही एक चेहरा है इनका। और एक चेहरा है उनका। इनके दिल में तो जाने कब से राग सारंग बज रहा है उनके लिए, वो भी कैहरवा ताल में। बस ढोला जी की छाया होले तो घूमर नृत्य करते-करते डोले, वो भी बाई सा बन के। और उनका दिल क्या चाहे ? यह तो भाई हमे भी नहीं मालूम है। अजी हम तो वो ही सुनते है जो इनका दिल फरमाता है हमसे। अब इनको ही नहीं मालूम के उनके दिल में  क्या है, तो हमें कैसे मालूम होगा।

आप भी सोच रहे होंगे की क्या ये "इनका, उनका" लगा रखा है। सीधे-सीधे नाम क्यूँ नहीं बताते भाई ?
अरे सरकार कुछ फ़सानो में नाम ना हीं ले तो ही अच्छा होता है। जिनपे लिख रहे हैं उनके लिए भी और काफ़ी हद तक लिखने वाले के लिए भी। वैसे भी किसी अंग्रेजी के लेखक ने कहा है, की नाम में आख़िर क्या रखा है। वो अलग बात है की 'विलियम साहब' ने सोलह आने सच कह कर, नीचे अपना ही नाम सुनहरे अक्षरों में गढ़वा रखा है, 'शेक्सपियर'।  नाम का क्या है ?!!अजी हमारी माने तो नाम ही तो सारी फ़जीहत की जड़ है। गलती से गलत जगह नुक्ता लग जाए तो भले भाले इंसान का धर्म भ्रष्ट हो जाए।  दोस्ती की पहली रवायत ये, के दोस्त नाम पर हमेशा पर्दा डाले रखना और हम तो ठहरे लंगोटिया यार इनके। तो मेहरबानी करके हमसे कुछ भी पूछिये, बस नाम ना पूछिये। ख़ैर, जो हो चुका है और जो मालूम है, उसकी दास्तांगोई तो कर ही सकते हैं । वैसे इस सब अफ़रा तफ़री में सबसे ज़्यादा गुणी, सुलझा हुआ, समझदार एवं ऐतबारी शख्स अगर कोई था, तो वो तो हम ही थे। ये तो आप समझ ही गए होंगे अब तक। नहीं समझे ? कोई बात नहीं, जैसे-जैसे मंज़िल करीब आएगी, सब अपने आप समझ में आ जाना है आपको।

आमना सामना जब हो तो बस दुआ सलाम हो जाए।  एक भी हर्फ़ ना वो बोले और इनकी क्या मज़ाल है जो एक भी लफ्ज़, लबों की डाली से टूट कर गिर जाए।  समझते सब है, बस कहने से कतरा जाएँ। किसी से पूछा उनका हाल इनसे, तो कहते हैं की काफ़ी परेशान है आजकल। हमने सोचा गोया होना भी चाहिए। भाई, ज़माने भर को परेशान करके कैसे किसी को सुकून से सोना चाहिए। मगर बस यही वो अदा है उनकी जिसपे, हमारी समझ से, इनका दिल फ़िदा होना चाहिए। अगर गलती से कोई और फ़िदा जो हो जाए, तो लीजिये साहब कहर ढह जाए, इबादत करते-करते काफिर होने की मोहर चस्पा हो जाए।

कल मिले थे वो इन्हे बाजार में। वो मिले थे या उनसे नैना मिले थे, ख़ुदा जाने, कहना मुश्किल है। लेकिन जनाब आसानी से कह भी कौन और कब पाया है। ये तो वो दरिया है साहब, जिसमे इंसान डूब के ही ज़िंदा निकल पाया है। खैर बताते हैं, बस नैना ही मिले थे और वो मुस्कुराके आगे बढ़ चले थे। कसम खुदकी, यह तो अपनी जगह से ज़रा भी ना हिले थे। आखें बंद कर उनके पल्लू को अपने चेहरे पे फिसलता महसूस कर रहे थे। उनकी खुशबुओं के बिख़रे कणो को समां से बटोरते चले थे।

कई बार सोचते हैं की दिल कड़ा कर एक बार बोल ही दे।  देखा जायेगा, जो होना होगा फिर हो जायेगा।  कम से कम वो भरम तो टूट जायेगा। आर या पार, आख़िर खड़े कहाँ है, ये तो पता चल जायेगा। फिर सोचते हैं रहने ही दें, फिर वो मज़ा कहा रह पायेगा। बेकद्री ही सही बाद में, पर सुकून तो ये गुमान थोड़े देर को दे ही जायेगा। इनके अंतर्मन की उस उथल पुथल को हम भाँप रहे थे, ना सुनने के डर से ये कुछ भी कहने से बच रहे थे।  वैसे भी समझदार नासमझ को नासमझ समझदार आखिर समझाए भी तो कैसे। बन्दर माफ़िक हैं, अपना तो बनाया नहीं जाता हमारा घर भी तोड़ के आगे बढ़ जायेगे।

कुछ दिन और बीते। देखने दिखाने के सिलसिले ज्यों के त्यों बरकरार रहे।  कभी कभी रस्ते मे टकरा जाएँ तो कुछ इकतरफ़ा हिम्मती बोल लबों से टपक जाएँ।  फिर अगली मुलाक़ात का बहाना सोचने में ज्यादातर वक़्त गुज़र जाए। हर पहल इनकी, सर पत्थरों से टकरा के वापस लौट जाए। और हम ये सोचते सोचते मरे जाएँ, की काश वो अपनी तरफ से कुछ समझ के ही आ जाएँ, वर्ना इन्हे  संभालना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जाए।

बेचैनी के आलम थे और मौसम सुहानी बौछारों वाला था। हर रिमझिम को तो बस आके, ठंडी ठंडी हवाओं से दिल सुलगाना था। भीगे मौसम में भी, इनके सूखे नैनों को पतझड़ का मौसम दिखलाना था।  बस यही सोच के कदम इन्हे आगे बढ़ाना था। बड़े भोलेनाथ के भक्त बने फिरते थे, तो थोड़ा भोलापन आना लाज़िमी ही था। उस दिन ठान के निकले थे घर से, जोश इतना मानो सर पे कफ़न बाँध के ही बड़े थे। आज तो कह के ही रहेंगे।  रंगीन जज़्बातों के सुई धागे से उनके  मन पटल पे उम्दा चिकनकारी कर के ही मानेगे। हमने भी इस बार रोका नहीं, रोकना भी संभव कहा था। भाई विनाशकाल विपरीत बुद्धि, हमारी या इनकी ये कहना कठिन था।

खैर सज धज के, टशन में निकले घर से। चेहरे की भाव भंगिमा बता थी, मानो पीछे गाना बज रहा हो " घर से निकलते ही, कुछ दूर चलते ही. ........ " आगे जो हुआ वो कतई सुरीला न हुआ। बड़ी कर्कश आवाज़ के स्वामी ने अपने वाहन की सीमाओं का परीक्षण करना चाहा, परन्तु उनके इस परिक्षण का अनुमान इन्हे ज्ञात न हो पाया। अपनी चहल कदमी में भूल गए की सड़क पे चलने का सलीक़ा क्या होता है और फिर वही गलती की, जो नहीं करनी चाहिए थी।  बीच सड़क पे बिन देखे कूद पड़े, लाख बचाते गाड़ी वाले भाई साहब मगर ऊपर वाले की मर्ज़ी के आगे न टिक सके। गाड़ी में गाना भी देखिये कितना सटीक बज रहा था, "नीचे पान की दूकान और ऊपर ............." जगह भी कुछ वैसी ही थी, मानो आँखों देखा हाल बयाँ कर रहा हो। मगर ये कोई गोविंदा की फ़िलिम नहीं थी, की कूद फांद करके बच जाए। टक्कर होनी ही थी, सो जा टकराये।

पैर तुड़वाये, माथे पे टाकेँ लगवाये, अब लेटें है अस्पताल के जनरल वार्ड में पलकें बिछाये। अगल बगल चार दोस्त हैं , जिसमे से तीन नामुराद तो पिछले डेढ़ घंटे से चाय पीने गए हैं। बाकि बचा एक, यानी की हम, सो वो तो बैठे ही हैं, दुर्योधन बन सिरहाने। उम्मीद है की उठेंगे यह, फिर से जल्द ही। आखिर उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है। वैसे ये उम्मीद तो हमारी है, इनकी तो आप जानते ही होंगे। उनको खबर तो पहुँचवा दी है, मगर आई तो नहीं है मोहतरमा अभी तक देखने।

इनके हाल पे एक शेर याद आया है, मुलाहिज़ा फरमाए "इब्तिदा इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिये होता है क्या।" वैसे आपको इत्तला कर दे कि ये मीर साहब थे, अरे वही अपने मीर तकि मीर।  यकायक याद आ गए तो कागज़ पे छा गए। कौन जाने उन्होंने भी दिल लगाया हो और मजनू बन पत्थरों से सर फुड़वाया हो। बाद में घरवालों ने अकल ठिकाने लगाई, तो बैठ गए लेकर कलम दवात और स्याही।  हाल-ए-दिल कागज़ों पे उकेरते गए और वाह-वाही लूटते गए। उम्रदराज़ होने के बाद उसी को नसीहत कह के चलते बने। गौर तलब बात तो यह है की, सालों पहले आगाह कर गए थे। मगर बड़े बुज़ुर्गों की सलाह नज़रअंदाज़ करना तो इंसानी फितरत है।

वैसे सच कहे तो हम लेखक भी अजीब होते हैं, अपनों के भेस में रक़ीब होते हैं। ऊपर गुलज़ार साहब शायद हमारे दो नैनो की ही बात कर रहे थे। अगल बगल टुकुर-टुकुर ताकते नैनो को भीड़ में कोई कहानी दिखाई दे जाए तो बढ़िया और कुछ नहीं मिला लिखने को, तो हो जाओ पानी-पानी। अब ये पानी दुख में निकले है या शर्मिंदा होने के कारण, ये तो लेखक के मिज़ाज़ पे मुनहसिर है।

अपनी ज़िन्दगी में तो कुछ खास होता नहीं है और दूसरों की, दूसरों की ज़िन्दगी में दख़लअंदाज़ी करते थकते नहीं हैं। बैठे रहते हैं उल्लूओं की तरह शाम तलक इंतज़ार में। चाय की चुस्कियों और गुलिस्तां में अधखिली कलियों को नोचते जैसे तैसे दिन गुज़ारा जाता है पर दिमाग में कुछ नहीं आता है और रात में, और रात में ही  कलम चलातें है की.................




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Friday, 13 October 2017

यादों के तकाज़े.............. ©






ना आना था, ना आयेगा कोई

क्यूँ फिर  रास्तों पे नज़रें जमाये है कोई।

मुद्दत हुई किसी की सूरत देखे हुये
सीरत पर आज भी बरक़रार है कोई।

आख़िर थे हम उनके अपने, गैर थोड़े ही कोई 
 ना अपना माना, तो फिर अपनाता क्यूँ कोई।

प्यार से फेरता हाथ जो, रो लेते गर रुलाता कोई 
पर वो ना आये, तो फिर पलके भिगोये क्यूँ कोई। 

 दोहरातें रिवायतें हम भी, गर समझाता कोई 
फिर नासमझ ख़यालात सजाता है क्यूँ  कोई। 

 शिद्दत से लिखे ख्यालों को पढ़ कर अधूरा बताये कोई,
ना पूरे होने थे, ना  फिर मुक्कमल कर पाया है कोई। 

 गुनगुनाये झूठ महफ़िल में, पहली सफ़ में सच जानता है कोई 
झूठ का है रुआब ऐसा, की सच पे ऐतबार करे ना कोई।



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